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आख़िर! फिर हम बिछड़ गए….

349.00
कभी-कभी वो एक ऐसी बेचैनी से शुरू होता है जो रूह तक को चुभ जाए। ये किताब उसी प्यार की दास्तान है— जो जितना गहरा था, उतना ही दर्दनाक निकला। जहाँ मोहब्बत ने दूरियाँ पैदा कीं,और दूरियों ने दिल में ऐसे सवाल छोड़े जिनके जवाब आज तक नहीं मिले।रिश्ता धीरे-धीरे टूटता नहीं… बल्कि रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है। और जब इश्क़ बोझ बन जाए,तो सबसे खतरनाक वक़्त वही होता है— फिर एक पल आता है जब “तुम हो” से ज़्यादा“तुम अब नहीं” महसूस होने लगता है। इसी खामोशी में मोहब्बत अपनी आखिरी सांस लेती है— और दर्द, बददुआओं की शक्ल में दिल की दीवारों पर काले निशान छोड़ जाता है। लेकिन हर अंत अंधेरा नहीं होता…कुछ अंधेरे ही इंसान को खुद से मिलाते हैं। “आख़िर! फिर हम बिछड़ गए....” एक ऐसे इश्क़ की कहानी है जो टूटकर बिखरा,दर्द बनकर जिया,और फिर ख़ामोशी में अपना नया जन्म पाया।
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आख़िर! फिर हम बिछड़ गए….

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कभी-कभी वो एक ऐसी बेचैनी से शुरू होता है जो रूह तक को चुभ जाए। ये किताब उसी प्यार की दास्तान है— जो जितना गहरा था, उतना ही दर्दनाक निकला। जहाँ मोहब्बत ने दूरियाँ पैदा कीं,और दूरियों ने दिल में ऐसे सवाल छोड़े जिनके जवाब आज तक नहीं मिले।रिश्ता धीरे-धीरे टूटता नहीं… बल्कि रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है। और जब इश्क़ बोझ बन जाए,तो सबसे खतरनाक वक़्त वही होता है— फिर एक पल आता है जब “तुम हो” से ज़्यादा“तुम अब नहीं” महसूस होने लगता है। इसी खामोशी में मोहब्बत अपनी आखिरी सांस लेती है— और दर्द, बददुआओं की शक्ल में दिल की दीवारों पर काले निशान छोड़ जाता है। लेकिन हर अंत अंधेरा नहीं होता…कुछ अंधेरे ही इंसान को खुद से मिलाते हैं। “आख़िर! फिर हम बिछड़ गए....” एक ऐसे इश्क़ की कहानी है जो टूटकर बिखरा,दर्द बनकर जिया,और फिर ख़ामोशी में अपना नया जन्म पाया।
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उड़ान एक.. इश्क

349.00
उड़ने का इरादा सबका था, पर हमने ठहरकर इश्क़ कमाया। यह उड़ान दिल की ज़मीन से शुरू हुई है।
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उड़ान एक.. इश्क

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एहसास दिल के

349.00
यह कविता-संग्रह महज़ पन्नों पर लिखे शब्द नहीं हैं ,यह संकलन है मेरे कई अटूट एहसासों का , जो दिल से कभी जाहिर हुए थे । इन रचनाओं में मैंने खुद को पिरोया है , संजोया है , उन लम्हों को , उन अनुभवों को जिन्हें मैं अपने 'उनके' साथ जीना चाहती थी लेकिन पारिवारिक कारणों से एक लम्बे समय तक हम दोनों अलग रहे। मैं प्रेम को जितने भी रूपों में देख पाई हूँ, जान पाई हूँ ,समझ पाई हूँ , उन्हीं एहसासों की अभिव्यक्ति इस पुस्तक के रूप में आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है । ​जब आप इन पन्नों को पलटेंगे तो मुझे आशा है कि आप शब्दों को सिर्फ़ पढ़ेंगे नहीं, बल्कि उन्हें महसूस भी करेंगे इस यात्रा में मेरे सहयात्री बनने के लिए धन्यवाद
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एहसास दिल के

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यह कविता-संग्रह महज़ पन्नों पर लिखे शब्द नहीं हैं ,यह संकलन है मेरे कई अटूट एहसासों का , जो दिल से कभी जाहिर हुए थे । इन रचनाओं में मैंने खुद को पिरोया है , संजोया है , उन लम्हों को , उन अनुभवों को जिन्हें मैं अपने 'उनके' साथ जीना चाहती थी लेकिन पारिवारिक कारणों से एक लम्बे समय तक हम दोनों अलग रहे। मैं प्रेम को जितने भी रूपों में देख पाई हूँ, जान पाई हूँ ,समझ पाई हूँ , उन्हीं एहसासों की अभिव्यक्ति इस पुस्तक के रूप में आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है । ​जब आप इन पन्नों को पलटेंगे तो मुझे आशा है कि आप शब्दों को सिर्फ़ पढ़ेंगे नहीं, बल्कि उन्हें महसूस भी करेंगे इस यात्रा में मेरे सहयात्री बनने के लिए धन्यवाद
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गुनाहों के चादर एक अधूरा सच

499.00
हाँ मै डरता हूं....... कोरे पन्नों पर खामोशी से डरता हूं बारिश की बूंद के अकेलेपन से डरता हूं मुरझाए फूलों की यादों से डरता हूं फर्श पर पड़ी बेजुबान सुबह की ओश से डरता हूं बर्फ की चादरों में ढकी सड़क की आह से डरता हूं हां मैं आईने की आहट से डरता हूं मैं कौन हूँ, कैसा हूं, खुदा की नीयत से डरता हूं किताबें लुटा दी खुद की तलाश मै जी हाँ मैं डरता हूं, शब्दों से झूठ कहता हूं मीर, जौन, इक़बाल, फैज, ग़ालिब.. इन सब की खामोशी से डरता हूं आखिर मैं किस की परछाई से डरता हूं नसीब ना हुआ दौलत मेरी, फिर भी उसकी आहट से डरता हूं जी हाँ मैं डरता हूं....!!"
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गुनाहों के चादर एक अधूरा सच

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हाँ मै डरता हूं....... कोरे पन्नों पर खामोशी से डरता हूं बारिश की बूंद के अकेलेपन से डरता हूं मुरझाए फूलों की यादों से डरता हूं फर्श पर पड़ी बेजुबान सुबह की ओश से डरता हूं बर्फ की चादरों में ढकी सड़क की आह से डरता हूं हां मैं आईने की आहट से डरता हूं मैं कौन हूँ, कैसा हूं, खुदा की नीयत से डरता हूं किताबें लुटा दी खुद की तलाश मै जी हाँ मैं डरता हूं, शब्दों से झूठ कहता हूं मीर, जौन, इक़बाल, फैज, ग़ालिब.. इन सब की खामोशी से डरता हूं आखिर मैं किस की परछाई से डरता हूं नसीब ना हुआ दौलत मेरी, फिर भी उसकी आहट से डरता हूं जी हाँ मैं डरता हूं....!!"
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जहाँ सुदामा वहाँ कृष्ण

299.00
साहित्य के क्षेत्र में गीता भाटिया जी का नाम नया नहीं है। साहित्य में इनका योगदान सराहनीय है। गीता जी को बचपन से लिखने का शौक था जो अनुभव के साथ-साथ और निखरता गया। गीता जी एक अनुभवी कवयित्री ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन उपन्यासकार एवं कहानीकार भी हैं। इन्होंने लगभग सभी विषयों को अपनी लेखनी में संजोया है। इनके लेखन काल्पनिक, ऐतिहासिक तथा सत्य घटनाओं से परिपूर्ण हैं। गीता जी की लिखी हर कहानी मानों दिल में उतरकर एक छाप छोड़ जाती हैं। इनकी कविताएँ एवं कहानियाँ जीवन के हर पहलू को दर्शाती हैं। गीता भाटिया जी की अब तक तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्य जगत में यह उनकी चौहदवीं पुस्तक है। हम आशा करते हैं भविष्य में भी साहित्य जगत में उनका योगदान हमें लाभान्वित करता रहेगा। उनकी सब पुस्तकें एमेजोन और फ्लिपकार्ट उपलब्ध हैं। पुस्तक के अंतिम पृष्ठ पर उन सब पुस्तकों विवरण उपलब्ध हैं। गीता भाटिया 53/41 वैस्ट पंजाबी बाग नई दिल्ली-110026 मोबाइल-9868858792 ई-मेल-geeta13sudesh8@gmail.com
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जहाँ सुदामा वहाँ कृष्ण

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साहित्य के क्षेत्र में गीता भाटिया जी का नाम नया नहीं है। साहित्य में इनका योगदान सराहनीय है। गीता जी को बचपन से लिखने का शौक था जो अनुभव के साथ-साथ और निखरता गया। गीता जी एक अनुभवी कवयित्री ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन उपन्यासकार एवं कहानीकार भी हैं। इन्होंने लगभग सभी विषयों को अपनी लेखनी में संजोया है। इनके लेखन काल्पनिक, ऐतिहासिक तथा सत्य घटनाओं से परिपूर्ण हैं। गीता जी की लिखी हर कहानी मानों दिल में उतरकर एक छाप छोड़ जाती हैं। इनकी कविताएँ एवं कहानियाँ जीवन के हर पहलू को दर्शाती हैं। गीता भाटिया जी की अब तक तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्य जगत में यह उनकी चौहदवीं पुस्तक है। हम आशा करते हैं भविष्य में भी साहित्य जगत में उनका योगदान हमें लाभान्वित करता रहेगा। उनकी सब पुस्तकें एमेजोन और फ्लिपकार्ट उपलब्ध हैं। पुस्तक के अंतिम पृष्ठ पर उन सब पुस्तकों विवरण उपलब्ध हैं। गीता भाटिया 53/41 वैस्ट पंजाबी बाग नई दिल्ली-110026 मोबाइल-9868858792 ई-मेल-geeta13sudesh8@gmail.com
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तुम और मैं, फिर से

249.00
पुस्तक परिचय ऋतिकेश कुमार गुप्ता का यह पहला साहित्यिक प्रयास है। "तुम और मैं, फिर से" सिर्फ़ एक लव स्टोरी नहीं है, यह रिश्तों, संघर्ष और सपनों की जर्नी है। यह कहानी है ऋषव और परी की, जो पहली नज़र में मिले और फिर जिंदगी की राहों में बिछड़कर भी एक-दूसरे के लिए बने रहे। कभी मोहब्बत, कभी गलतफहमियाँ, कभी दूरी और कभी सपनों की जंग-इस सफ़र में हर वो एहसास है जो दिल को छू जाए। IAS की तैयारी, बिज़नेस बनाने का संघर्ष, परिवार का साथ और भरोसे की अहमियत -इस किताब में जिंदगी के वो सारे रंग हैं, जिन्हें हर इंसान कहीं न कहीं महसूस करता है। दूरी चाहे जितनी भी हो, एहसास पास रहते हैं, यादों के सिलसिले दिल में खास रहते हैं। मिलना और बिछड़ना तो किस्मत की बातें हैं, मगर सच्चे रिश्ते हर हाल में जिंदा रहते हैं
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तुम और मैं, फिर से

249.00
पुस्तक परिचय ऋतिकेश कुमार गुप्ता का यह पहला साहित्यिक प्रयास है। "तुम और मैं, फिर से" सिर्फ़ एक लव स्टोरी नहीं है, यह रिश्तों, संघर्ष और सपनों की जर्नी है। यह कहानी है ऋषव और परी की, जो पहली नज़र में मिले और फिर जिंदगी की राहों में बिछड़कर भी एक-दूसरे के लिए बने रहे। कभी मोहब्बत, कभी गलतफहमियाँ, कभी दूरी और कभी सपनों की जंग-इस सफ़र में हर वो एहसास है जो दिल को छू जाए। IAS की तैयारी, बिज़नेस बनाने का संघर्ष, परिवार का साथ और भरोसे की अहमियत -इस किताब में जिंदगी के वो सारे रंग हैं, जिन्हें हर इंसान कहीं न कहीं महसूस करता है। दूरी चाहे जितनी भी हो, एहसास पास रहते हैं, यादों के सिलसिले दिल में खास रहते हैं। मिलना और बिछड़ना तो किस्मत की बातें हैं, मगर सच्चे रिश्ते हर हाल में जिंदा रहते हैं
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तुम कैसे लड़के हो

299.00
तुम कैसे लड़के हो' पुस्तक के लेखक शिवम् यादव ने यह पुस्तक किसी प्रेम कथा के रूप में नहीं, बल्कि उन नए और बेचैन युवाओं से संवाद के उद्देश्य से लिखी है, जो विवेक का मार्ग छोड़कर ऐसे रास्तों पर भटक रहे हैं जो न उनके लिए हितकर हैं और न समाज के लिए। वैसे तो शिवम् यादव ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से सामाजिक विज्ञान में स्नातक किया है तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से परास्नातक की अपूर्ण पढ़ाई की है, लेकिन उनके जीवन और लेखन के अधिक निकट हमेशा खुली सड़कें, टूटे हुए और बेचैन लोग रहे हैं। यही अनुभव उनकी संवेदनशीलता और वैचारिक गंभीरता का आधार हैं। लेखक श्री प्रेमचंद यादव गुरुजी तथा श्री हरिकेश यादव गुरूजी के प्रति कृतज्ञ हैं, क्योंकि दोनों ने समय-समय पर उनका हौसला बढ़ाया और लेखन के प्रति उन्हें निरंतर प्रेरित किया। इसके साथ ही लेखक उन लोगों के प्रति भी कृतज्ञ हैं, जिनके प्रति उनकी समर्पित सेवा के बावजूद उन्होंने वैमनस्य छोड़ना उचित नहीं समझा और माहौल को टॉक्सिक बनाए रखना ज्यादा श्रेष्ठ समझा।
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तुम कैसे लड़के हो

299.00
तुम कैसे लड़के हो' पुस्तक के लेखक शिवम् यादव ने यह पुस्तक किसी प्रेम कथा के रूप में नहीं, बल्कि उन नए और बेचैन युवाओं से संवाद के उद्देश्य से लिखी है, जो विवेक का मार्ग छोड़कर ऐसे रास्तों पर भटक रहे हैं जो न उनके लिए हितकर हैं और न समाज के लिए। वैसे तो शिवम् यादव ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से सामाजिक विज्ञान में स्नातक किया है तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से परास्नातक की अपूर्ण पढ़ाई की है, लेकिन उनके जीवन और लेखन के अधिक निकट हमेशा खुली सड़कें, टूटे हुए और बेचैन लोग रहे हैं। यही अनुभव उनकी संवेदनशीलता और वैचारिक गंभीरता का आधार हैं। लेखक श्री प्रेमचंद यादव गुरुजी तथा श्री हरिकेश यादव गुरूजी के प्रति कृतज्ञ हैं, क्योंकि दोनों ने समय-समय पर उनका हौसला बढ़ाया और लेखन के प्रति उन्हें निरंतर प्रेरित किया। इसके साथ ही लेखक उन लोगों के प्रति भी कृतज्ञ हैं, जिनके प्रति उनकी समर्पित सेवा के बावजूद उन्होंने वैमनस्य छोड़ना उचित नहीं समझा और माहौल को टॉक्सिक बनाए रखना ज्यादा श्रेष्ठ समझा।
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बियॉन्ड मैटर

799.00
बियॉन्ड मैटर केवल शब्दों का संग्रह नहीं, यह एक आंतरिक यात्रा का द्वार है। यह हमें उस अदृश्य धागे की ओर ले जाती है जो मन और पदार्थ को एक ही इकाई में पिरोता है। यहाँ विचार केवल मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली लहरें नहीं हैं, बल्कि वे हमारी वास्तविकता को आकार देने वाले बीज हैं। यह पुस्तक दिखाती है कि हमारी चेतना, हमारी भावनाएँ और हमारे इरादे किस तरह बाहरी दुनिया की संरचना में गूँज पैदा करते हैं। न्यूरोप्लास्टिसिटी की खोजों से लेकर गहरे दार्शनिक प्रश्नों तक, यह यात्रा यह स्पष्ट करती है कि हम केवल परिस्थितियों के शिकार नहीं हैं, बल्कि उन परिस्थितियों को रचने वाले भी हैं। बियॉन्ड मैटर पाठक को यह अनुभव कराती है कि ध्यान, आत्म जागरूकता और सचेत इरादे के माध्यम से मस्तिष्क को फिर से गढ़ा जा सकता है। यह परिवर्तन केवल मानसिक नहीं, बल्कि अस्तित्व के हर स्तर पर गहराई तक प्रभाव डालता है - शरीर, स्वास्थ्य, संबंध और जीवन की दिशा तक। यह कोई साधारण मार्गदर्शक नहीं, बल्कि एक निमंत्रण है अपने भीतर उतरने का, उस निस्तब्ध स्रोत को छूने का जहाँ विचार और पदार्थ की सीमाएँ मिट जाती हैं। यह किताब हमें याद दिलाती है कि हमारी वास्तविक शक्ति बाहर नहीं, बल्कि भीतर सोई हुई है और जब हम उसे जगाते हैं, तब दुनिया भी हमारे साथ बदल जाती है।
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बियॉन्ड मैटर

799.00
बियॉन्ड मैटर केवल शब्दों का संग्रह नहीं, यह एक आंतरिक यात्रा का द्वार है। यह हमें उस अदृश्य धागे की ओर ले जाती है जो मन और पदार्थ को एक ही इकाई में पिरोता है। यहाँ विचार केवल मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली लहरें नहीं हैं, बल्कि वे हमारी वास्तविकता को आकार देने वाले बीज हैं। यह पुस्तक दिखाती है कि हमारी चेतना, हमारी भावनाएँ और हमारे इरादे किस तरह बाहरी दुनिया की संरचना में गूँज पैदा करते हैं। न्यूरोप्लास्टिसिटी की खोजों से लेकर गहरे दार्शनिक प्रश्नों तक, यह यात्रा यह स्पष्ट करती है कि हम केवल परिस्थितियों के शिकार नहीं हैं, बल्कि उन परिस्थितियों को रचने वाले भी हैं। बियॉन्ड मैटर पाठक को यह अनुभव कराती है कि ध्यान, आत्म जागरूकता और सचेत इरादे के माध्यम से मस्तिष्क को फिर से गढ़ा जा सकता है। यह परिवर्तन केवल मानसिक नहीं, बल्कि अस्तित्व के हर स्तर पर गहराई तक प्रभाव डालता है - शरीर, स्वास्थ्य, संबंध और जीवन की दिशा तक। यह कोई साधारण मार्गदर्शक नहीं, बल्कि एक निमंत्रण है अपने भीतर उतरने का, उस निस्तब्ध स्रोत को छूने का जहाँ विचार और पदार्थ की सीमाएँ मिट जाती हैं। यह किताब हमें याद दिलाती है कि हमारी वास्तविक शक्ति बाहर नहीं, बल्कि भीतर सोई हुई है और जब हम उसे जगाते हैं, तब दुनिया भी हमारे साथ बदल जाती है।
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